महाराष्ट्र मानवाधिकार आयोग ( MSHRC )हुआ फ़िल्म, टीवी और थियेटर वर्करों के हितों को लेकर शख्त

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मुम्बई| महाराष्ट्र मानवाधिकार आयोग ( MSHRC) ने फ़िल्म,टेलीविजन और थियेटर जगत में कार्यरत लाखों मजदूरों और टेक्नीशियनों के हालात को संज्ञान लेते हुए अपने 26 अगस्त के आदेश में राज्य श्रम विभाग को फ़िल्म, टीवी उद्योग और थियेटर से जुड़े श्रमिकों की मांगों पर गौर करने और यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है कि पूर्व गठित समिति द्वारा उस पर चर्चा की जाए तथा तीन महीने के अंदर इसका हल निकाला जाए।

फेडरेशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्प्लॉयज (एफडब्लूआइसीई ) के प्रेसिडेंट बीएन तिवारी और समाजसेवक डॉक्टर योगेश दुबे ने महाराष्ट्र मानवाधिकार आयोग (एमएचआरसी) से “टीवी,थियेटर और फिल्म उद्योग में कार्यरत वर्करों तथा टेक्नीशियनों के काम करने के घंटों,कम वेतन और खराब सुविधाओं के बारे में शिकायत की थी जिसके बाद आयोग ने राज्य श्रम आयुक्त को निर्देश दिया है कि वह अपने स्तर से सभी मुद्दों को तीन महीने के भीतर हल करें और एक अनुपालन रिपोर्ट सबमिट करें।

पिछले साल मार्च माह में राज्य ने सरकारी अधिकारियों और फ़िल्म तथा टीवी जगत के प्रतिनिधियों की 29-सदस्यीय समिति का गठन किया था और कहा था कि फ़िल्म जगत के मजदूरों एवं टेक्नीशियनों द्वारा सामना किये जा रहे महत्वपूर्ण मुद्दों पर गौर करें और उन्हें हल करें। इस समिति ने पिछले 17 महीनों में केवल एक बार बैठक की।इस पर संज्ञान लेते हुए महाराष्ट्र मानवाधिकार आयोग ने 26 अगस्त के अपने आदेश में राज्य श्रम विभाग को फ़िल्म तथा टीवी उद्योग श्रमिकों की मांगों पर गौर करने और उन्हें हल करने का निर्देश दिया ।

लॉकडाउन के बाद कई फिल्म और टीवी टेक्नीशियन नौकरी से बाहर हो गए हैं और उनका वेतन भी रुक गया है। डॉ योगेश दुबे, जिन्होंने फेडरेशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्प्लॉयज की ओर से महाराष्ट्र मानवाधिकार आयोग में शिकायत दर्ज की थी उन्होंने और फेडरेशन के प्रेसिडेंट बीएन तिवारी ने कहा कि हम मानवाधिकार आयोग के फैसले का स्वागत करते हैं। हमें उम्मीद है कि आयोग के दबाव में श्रम विभाग हमारे मुद्दों को हल करना शुरू कर देगा। जिससे लाखों वर्करों का भला होगा। श्री तिवारी और डॉक्टर योगेश दुबे इस कार्य के लिए तीन साल से लगे थे।इसके लिए आयोग के समक्ष कई सुनवाई हुई।

फेडरेशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्प्लॉयज (एफडब्लूआइसीई) फ़िल्म और टीवी जगत से जुड़े लाखों सदस्यों का प्रतिनिधित्व करता है, जिनमें तकनीशियन, जूनियर कलाकार, स्पॉट बॉय, इलेक्ट्रीशियन, कला निर्देशक, डबिंग कलाकार, बढ़ई, मेकअप कलाकार और फोटोग्राफर आदि शामिल हैं।

2017 में सिने टेक्नीशियन फिल्म सिटी में 15 दिनों के विरोध प्रदर्शन पर गए थे ताकि बेहतर काम करने का माहौल बने।उसी समय इस मुद्दे को फेडरेशन के प्रेसिडेंट बीएन तिवारी तथा समाजसेवक डॉक्टर योगेश दुबे ने मानवाधिकार आयोग से भी फ़िल्म तथा टीवी उद्योग से जुड़े लाखों टेक्नीशियनों और मजदूरों की समस्या को लेकर लिखित शिकायत किया था।

इसकी शिकायत में एफडब्लूआइसीई ने 12 से 16 घंटे तक की शिफ्ट्स, खराब वेज सिस्टम और सेट्स पर स्वच्छता न होने की शिकायत की थी।

महाराष्ट्र मानवाधिकार आयोग की सुनवाई में भाग लेने वाले फेडरेशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्प्लॉयज के प्रेसिडेंट बी एन तिवारी,जनरल सेक्रेटरी अशोक दुबे और ट्रेजरार गंगेश्वरलाल श्रीवास्तव ने कहा कि तात्कालिक चिंता मजदूरी बढ़ोतरी की है। “पाँच साल के लिए, मजदूरी समान रही है। न्यूनतम वेतन में वृद्धि करने की आवश्यकता है। कोविड -19 महामारी ने श्रमिकों की वित्तीय स्थिति को और खराब कर दिया है। साथ ही श्रमिको को पौष्टिक आहार नहीं मिल रहा है।कोरोना काल मे भी मजदूरों और टेक्नीशियनों से बारह घंटे या उससे भी ज्यादा काम लिया जा रहा है।

श्री बीएन तिवारी ने महाराष्ट्र मानवाधिकार आयोग के समक्ष सुनवाई में स्पस्ट कहा कि हमारे टेक्नीशियनों और मजदूरों की सामान्य कामगारों की तरह ड्यूटी होनी चाहिए।उनकी भी साप्ताहिक अवकाश और 8 घंटे की ड्यूटी होनी चाहिए साथ ही उनके लाभ के लिए अन्य नियम भी लागू होना चाहिए।

महाराष्ट्र मानवाधिकार आयोग के कार्यवाहक चेयरपर्सन एम ए सईद ने अपने आदेश में कहा कि जहां महामारी ने सरकारी कामकाज में देरी की है, टीवी और फिल्म उद्योग के श्रमिकों के मुद्दों को जल्द ही हल किया जाना चाहिए।

मामले की सुनवाई के दौरान डिप्टी लेबर कमिश्नर रविराज इलवे ने कहा कि सिने कर्मचारियों को प्रति माह न्यूनतम 15,000 रुपये का वेतन दिया जाता है। जिस पर श्री बीएन तिवारी ने अपना पक्ष रखा कि ये 15 हजार रुपये न्यूनतम वेतन 8 घंटे के लिए है और 12 घंटे काम करने पर न्यूनतम वेतन 30 हजार होनी चाहिए।ऐसी हमारी मांग है। डिप्टी लेबर कमिश्नर ने बताया कि निर्माताओं के संगठन, सिने कर्मचारियों और श्रम विभाग की एक समिति वेतनमान और अन्य मुद्दों पर विचार-विमर्श करेगी।

इलवे ने बताया “केंद्रीय अधिनियम द्वारा सिने श्रमिकों को विनियमित किया जाता है। राज्य का अधिकार क्षेत्र सीमित है। आठ घंटे की ड्यूटी से परे, राज्य तभी कार्रवाई कर सकता है जब कोई विशिष्ट शिकायत हो। ” उन्होंने कहा कि सरकार भी महामारी के कारण मार्च से निरीक्षण करने में असमर्थ रही है। “पिछले एक या दो वर्षों में, प्रोडक्शन हाउस ने श्रमिकों की काम करने की स्थिति में सुधार के प्रयास किए हैं।श्री बीएन तिवारी ने MSHRC ,महाराष्ट्र सरकार और श्रम विभाग तथा डॉक्टर योगेश दुबे का इसके लिए धन्यवाद दिया है।