Full Review :बॉलीवुड कलाकारों से सजी साउथ की फिल्म है Laxmi, लॉजिक गायब, कॉमेडी और डर भी अजीबोगरीब

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Laxmii

कलाकार : अक्षय कुमार, कियारा आडवाणी, शदर केलकर
निर्देशक : राघव लॉरेंस
अगर आपने कांचना-2 देखा है तो यकीनन आपको अक्षय कुमार और कियारा आडवाणी स्टारर फिल्म लक्ष्मी को देखने में बिल्कुल मजा नहीं आने वाला है। इस फिल्म में सिर्फ किरदारों को बदला गया है जबकि डर और कॉमेडी के घालमेल के चक्कर में डर तो दिखाई दिया लेकिन कॉमेडी की टाइमिंग गड़बड़ा गई। ऐसे में दर्शकों के चेहरे में सिर्फ मुस्कुराहट उभरती है तो कुछ ही सेकंड में गायब हो जाएगी। कहानी से लॉजिक गायब है। कुछ तो भी देखने के शौकीन लोगों के यह अच्छी फिल्म हो सकती है। बाकी जिन्हें लॉजिक और खूबसूरत संदेश देखना की आदत है। वे मायूस हो सकते है। एक तरह से इसे बॉलीवुड कलाकार से सजी साउथ की फिल्म कह सकते हैं। और हां, फिल्म में किसी ने कहा कि लक्ष्मी फिल्म के जरिए धार्मिक भावनाओं को आहत किया गया है तो किसी ने फिल्म के जरिए लव जिहाद फैलाए जाने की बात कही। अब सबसे पहले ये साफ कर दें कि लक्ष्मी में ऐसा कुछ नहीं दिखाया गया है। किसी का कोई अपमान नहीं हुआ है। अब जब ऐसा कोई विवाद है ही नहीं तो सीधे फिल्म ह्यलक्ष्मीह्ण पर अपना फोकस जमाते हैं।

कहानी (Story)
आसिफ ( अक्षय कुमार) भूत-प्रेत में विश्वास नहीं रखता है। विज्ञान में भरोसा जताने वाला आसिफ दूसरे लोगों को भी जागरुक करने का काम करता है। आसिफ काफी मॉर्डन सोच वाला इंसान है जो जाति-धर्म को नहीं मानता है। आसिफ रश्मि ( कियारा आडवाणी) से प्यार करता है। क्योंकि आसिफ मुसलमान है और रश्मि हिंदू तो परिवार को ये रिश्ता रास नहीं आता है। दोनों भाग कर शादी कर लेते हैं। लेकिन फिर रश्मि की मां पूरे तीन साल बाद अपनी बेटी को फोन मिला घर आने को कह देती है। अब यहीं से कहानी में आना शुरू होते हैं ट्विस्ट। आसिफ, रश्मि संग उसके मायके पहुंच जाता है। जिस कॉलोनी में रश्मि का परिवार रहता है, उसके एक प्लॉट में भूत-प्रेत का साया बताया जाता है।

लेकिन आसिफ हिम्मत दिखाते हुए उस प्लॉट में चला जाता है और लक्ष्मी की आत्मा उसे पकड़ लेती है। अब आसिफ के शरीर में बसी लक्ष्मी उससे क्या-क्या कारनामे करवाती है, आगे की कहानी उस ट्रैक पर बढ़ती दिखती है। ट्रेलर में आपने उन कारनामों की झलक भी देख ही रखी है। ऐसे में क्या आसिफ, लक्ष्मी से मुक्त हो पाता है? लक्ष्मी का असल उदेश्य क्या है? लक्ष्मी को किस बात का इतना गुस्सा है? डायरेक्टर राघव लॉरेंस की लक्ष्मी देख इन सवालों के जवाब मिल जाएंगे।

लक्ष्मी देखने से पहले आपको अपने लॉजिक को पीछे छोड़ना बहुत जरूरी है। अगर आप इस फिल्म के साथ ह्किंतु-परंतु लगाना शुरू कर देंगे, तो मजा किरकिरा होना तय है। ऐसे में लक्ष्मी को सिर्फ और सिर्फ मनोरंजन के लिहाज से देखें। अगर आप ऐसा करने में कामयाब रहते हैं तो फिल्म देख आप निराश नहीं होंगे। फिल्म पूरे 2 घंटे 20 मिनट तक आपके मनोरंजन का ख्याल रखेगी। ये कभी आपको गुदगुदाएगी तो कभी डराएगी। हां ये जरूर है कि फिल्म अपने असल मुद्दे तक पहुंचने के लिए काफी टाइम लगा देती है। हैरानी की बात ये रही है कि हर कोई अक्षय का किन्नर लुक देखने के लिए बेकरार होगा, लेकिन उनका वो अंदाज आपको इंटरवल के बाद ही मिलने वाला है। तो पेशेंस आपको जरूरत से ज्यादा रखना पड़ेगा।

किसकी एक्टिंग कैसी रही..
अक्षय कुमार:
लक्ष्मी का एक्टिंग डिपार्टमेंट धमाकेदार कहा जाएगा। अक्षय कुमार इस फिल्म में अलग ही फॉर्म में नजर आ रहे हैं। उनका लुक तो चर्चा में था ही, लेकिन जिस शिद्दत से अक्षय कुमार ने हर इमोशन बयां किए हैं, वो देख आप भी उनकी तारीफ करते नहीं थकेंगे। इस फिल्म में अक्षय का डांस भी आपको लंबे समय तक याद रहने वाला है। उनका बम भोले गाना सभी को झूमने पर मजबूर करेगा।
कियारा आडवाणी: अक्षय की पत्नी के रोल में कियारा का काम भी बढ़िया रहा है। फिल्म में उन्हें ज्यादा कुछ तो करने को नहीं दिया गया है, लेकिन अक्षय को उन्होंने बेहतरीन अंदाज में सपोर्ट किया है।

राजेश शर्मा: रश्मि के पिता के रोल में राजेश शर्मा भी काफी नेचुरल लगे हैं। उनकी अपनी एक कॉमिक टाइमिंग हैं जो हर किरदार के साथ फिट बैठ जाती है।
आएशा रजा मिश्रा: रश्मि की मां के किरदार में आएशा रजा मिश्रा ने भी सभी को हंसने पर मजबूर किया है। फिल्म में आएशा की अश्विनी कलेसकर संग बढ़िया जुगलबंदी देखने को मिली है।
शरद केलकर: फिल्म में शरद केलकर का कैमियो भी रखा गया है। उनका काम जानदार और शानदार रहा है। अगर फिल्म देखने के बाद आपको उनकी परफॉर्मेंस बेस्ट भी लगने लगे, तो हैरानी नहीं होगी।

कहा कुछ…और सामने आया कुछ
लक्ष्मी का निर्देशन राघव लॉरेंस ने किया है जिन्होंने आॅरिजनल फिल्म कंचना को भी डायरेक्ट किया था। लेकिन इस फिल्म को जिस वजह से इतना प्रमोट किया जा रहा था, वो संदेश सही अंदाज में दर्शकों तक नहीं पहुंच पाया है। फिल्म को लेकर कहा गया था कि ये देखने के बाद किन्नरों के प्रति लोगों का नजरिया बदलेगा। अब नजरिया कितना बदला ये बताना तो मुश्किल है, लेकिन क्या उनके संघर्ष को फिल्म में सही अंदाज में दिखाया गया है, तो जवाब है नहीं। फिल्म में एक किन्नर के ह्यबदलेह्ण की कहानी दिखाई गई है। किन्नरों का संघर्ष दिखाने के नाम पर सिर्फ 10 मिनट की एंड में खानापूर्ति की गई है। फिल्म का मूल संदेश कही गायब दिखता है।

सिर्फ एक बार देखें वो भी जब टाइम मिले
वैसे डायरेक्टर को इतना क्रेडिट जरूर दिया जा सकता है कि फिल्म का क्लाइमेक्स अच्छे से फिल्माया गया है। अक्षय के रौद्र रूप से लेकर वीएफएक्स का इस्तेमाल करने तक, क्लाइमेक्स पर काफी मेहनत की गई है। ऐसे में दिवाली के मौके पर रिलीज हुई अक्षय कुमार की लक्ष्मी सिर्फ और सिर्फ एंटरटेनमेंट के लिहाज से एक बार देखी जा सकती है। लॉजिक और संदेश की उम्मीद लगाना फिजूल होगा।