Namak Haraam को हो गए 47 साल, देखिए पहले प्रीमियर का रेयर पोस्टर

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Namak Haraam Premiere Poster
Namak Haraam Premiere Poster

BolBolBollywood.com स्पेशल स्टोरी, मुम्बई। साल 1973 सुपर डुपर हिट फिल्म नमक हराम (Nanak Haraam) के लिए जाना जाता है। ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में बनी इस फ़िल्म का प्रीमियर  22 नवंबर 1973 बॉम्बे (मुंबई) में रखा गया था। अब फ़िल्म के 47 साल हो चुके हैं। इस खास मौके पर BoBolBollwood.com सिनेमाई फैंस के लिए एक खास तोहफा देने जा रहा हैं। दरअसल, हम इस प्रीमियर का वो रेयर पोस्टर सांझा करने जा रहे हैं जिसके मुताबिक जुहू स्थित नॉवेल्टी थियेटर में रात 9 बजे इसका प्रीमियर रखा गया था। इस पोस्टर में अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना की तस्वीरों को शामिल किया गया हैं।

दरअसल, नमक हराम 1973 में बनी हिन्दी भाषा की नाट्य फिल्म है। इसका निर्देशन ऋषिकेश मुखर्जी ने किया है। संगीत राहुल देव बर्मन का है, गुलज़ार की पटकथा और आनंद बख्शी के बोल हैं। फिल्म में राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन हैं। इसमें रेखा, असरानी, रज़ा मुराद, ए के हंगल, सिमी गरेवाल और ओम शिवपुरी भी हैं। राजेश खन्ना को इस फिल्म के लिए 1974 में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता (हिन्दी) के लिए तीसरा बीएफजेए पुरस्कार मिला और अमिताभ बच्चन ने 1974 में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का दूसरा फिल्मफेयर पुरस्कार जीता।

Namak Haraam movie 1973

दूसरी बार दिखी थी राजेश खन्ना और अमिताभ की जोड़ी
आनन्द के बाद राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन अभिनीत यह दूसरी ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म थी। ‛दीये जलते हैं’’, ‛नदिया से दरिया’ और ‛मैं शायर बदनाम’ सबसे यादगार धुनें हैं, जो सभी किशोर कुमार द्वारा गाए गए हैं और राजेश खन्ना पर चित्रित हैं। नमक हराम बॉक्स ऑफिस पर हिट रही थी।

यह है कहानी:  सोमनाथ ‛सोमू’ (राजेश खन्ना) दिल्ली में अपनी विधवा माँ और कुंवारी बहन, सरला के साथ एक कुटिया में रहता है। वो कलकत्ता में रहने वाले अमीर परिवार में जन्में, विक्रम महाराज उर्फ विक्की (अमिताभ बच्चन) का दोस्त रहता है। विक्की के पिता, दामोदर को एक दिन दिल का दौरा पड़ जाता है, जिसके बाद उन्हें दो महीने के लिए आराम करने को कहा जाता है। विक्की अपने पिता के व्यापार को संभालने लगता है, और उसी बीच वो कई पुराने कर्मचारी और यूनियन लीडर से पंगा ले लेता है, जिससे वे लोग हड़ताल पर चले जाते हैं। उसके पिता उस मामले में हस्तक्षेप करते हैं और विक्की को उन सभी से माफी मांगते को कहते हैं। विक्की माफी मांग लेता है और सब कुछ सामान्य हो जाता है।

विक्की अपने इस अपमान के बारे में सोमू को बताता है और वो दोनों बिपिनलाल (ए के हंगल) को सबक सिखाने की सोचते हैं। सोमू और विक्की कलकत्ता में चले जाते हैं। सोमू उसी के मिल में मजदूर का काम करने लगता है और अपने साथी-मजदूरों के साथ काफी दोस्ती करने लगता है। वो उनकी कई तरह से मदद करता है और बाद में यूनियन लीडर का चुनाव लड़ कर जीत जाता है, जिससे बिपिनलाल की जगह सोमू यूनियन लीडर बन जाता है। मालिक के रूप में विक्की और यूनियन लीडर के रूप में सोमू के होने से उन्हें कोई भी रोक नहीं पाता है।

विक्की के पिता, दामोदर को इस बात का पता चलता है कि उसका बेटा कोई मध्यम वर्गीय छोरे के प्रभाव में आ चुका है। ये बात जानकर वो तिलमिला उठता है। दामोदर अपने बेटे को सोमू के प्रभाव से हटाने के लिए कई सारे काम करता है, जिससे अंत में ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हो जाती है कि एक दोस्त की दूसरे दोस्त के हाथों में मौत हो जाती है।