Review: घुप्प सन्नाटे में रिलीज हुई Tuesdays & Fridays, बेदम कहानी, कमजोर एक्टिंग और पैसे की बर्बादी

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Tuesdays and Fridays

मुंबई। घुप्प सन्नाटे में शुक्रवार 19 फरवरी को दबे पांव फिल्म ‘ट्यूसडेज एंड फ्राइडे’(TUESDAYS & FRIDAYS) रिलीज कर दी गई। फिल्म को लेकर न तो कई प्रचार न ही किसी तरह की स्ट्रेटजी सामने आई। कही कोई चर्चा तक नहीं। क्या कोई संजय लीला भंसाली के किसी प्रोजेक्ट को लेकर ऐसा सोच भी सकता है। लेकिन, यह हुआ है और क्यों हुआ है इसका थोडा बहुत अनुमान फिल्म को देखने पर तो लग ही जाता है। दरअसल, सुपर कैसेट्स इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड, भंसाली प्रोडक्शंस और हाय-हैट प्रोडक्शंस बैनर्स की इस फिल्म की शूटिंग दो साल पहले ही खत्म हो चुकी थी। इसके बाद इसके अब रिलीज किया गया। इसमें अभिनेता अनमोल ठकेरिया ढिल्लन और झटलेखा मल्होत्रा की प्रमुख भूमिकाएं है।

यह है कहानी
यह फिल्म एक राइटर और एडवोकेट की लव स्टोरी है। वरुण (अनमोल ठकेरिया ढिल्लन) एक बेस्टसेलिंग लेखक और स्मार्ट युवा है। जबकि सिया (झटलेखा) एक इंटरटेनमेंट लॉयर है। दोनों पेशेवर कारणों से एक-दूसरे से मिल बैठते हैं। इसी वजह से इन दोनों में एक केमेस्ट्री विकसित हो जाती है। कहानी में वरुण प्रतिबद्धता-फोबिक हैं। उसका मानना होता है कि किसी भी लव स्टोरी का अंत हमेशा ब्रेकअप होता है। ऐसे में सिया के कानूनी माइंड में एक आइडिया आता है। जिसके तहत ये वरुण और सिया मंगलवार और शुक्रवार को प्रेमी-प्रेमिका के रूप में मिलेंगे। जबकि सप्ताह के अन्य दिनों में वे एक राइटर और लॉयर की तरह मुलाकात करेंगे। जैसे जैसे उनकी दो सप्ताह की डेटिंग आगे बढ़ती है, वे एक-दूसरे के प्यार में पड़ जाते हैं। इस बीच इस कपल की सिंगल मदर्स की भूमिका में निकी वालिया और अनुराधा पटेल के भी किरदार भी दिलचस्प है।

यह समझ से परे हैं तरणवीर सिंह ने यह पटकथा क्या सोचकर लिखी थी। जो हर एंगल से कमजोर नजर आती है। सप्ताह का रोमांस की अवधारणा बहुत ही अजीब है। इसके अलावा, वरुण और सिया की प्रेम कहानी में कोई गर्मजोशी नहीं हैै। वास्तव में इस प्रेम कहानी में एक भी सीन ऐसा नहीं दिखा जो रोमांटिक नजर आए।
अभिनेता अनमोल ठकेरिया ढिल्लन एक साधारण शुरूआत करते हैं। उनका अभिनय बहुत प्रभावशाली नहीं है। उनकी कमी की शुरूआत का दोष स्क्रिप्ट और निर्देशक पर भी पड़ेगा। झटलेका एक आत्मविश्वास से भरी अभिनेत्री हैं और एक दमदार अभिनय करती हैं लेकिन वह भी अभिनय का प्रभाव छोड़ने में सफल नहीं हो पाती है। दोनों ही डेब्यू कलाकारों को अपने काम के लिए ज्यादा मेहनत की जरूरत थी। लेकिन वे अधिकतर ओवर एक्टिंग करते ही दिखाई दिए।

डॉ. राधिका मल्होत्रा के रूप में निकी वालिया औसत हैं। जोया मोरानी काजल के रूप में बेहतरीन काम करती हैं। नयन शुक्ल ने एक प्यारा सा निशान पाट दिया। कामिनी खन्ना खाला के रूप में चिढ़ती हैं। नबील की भूमिका में एकलव्य कश्यप शायद ही प्रभावित करते हैं। रीम शेख, सिया की सौतेली बहन, तान्या के रूप में अपनी खुद की है। अनुराधा पटेल को शायद ही निम्मी के रूप में ज्यादा कुछ हासिल होने की गुंजाइश है। परवीन डबास तो निशांत जैसी ही हैं। नेहा कक्कर खुद खेलती हैं और स्टार वैल्यू जोड़ती हैं। परमीत सेठी एक विशेष उपस्थिति में ऐसा है। आशिम गुलाटी (जतिन सिंह के रूप में), इब्राहिम चौधरी (शॉन के रूप में), नीरज खेत्रपाल (सिया के बॉस के रूप में) और बाकी लोग रूटीन सपोर्ट करते दिखाई देते हैं।

डायरेक्शन औसत से कम
डायरेक्टर तरनवीर सिंह का काम औसत से काफी कमजोर है। वे अच्छे नरेशन से दर्शकों पर पकड़ बनाने में सफल हो पाते हैं और न ही कलाकारों से उनका बेस्ट निकाल पाते हैं। टोनी कक्कर का संगीत साधारण है। जरूरत से ज्यादा गाने फिल्म में की बोरिंगनेस बढ़ाते है। अधिकांश गानों के लिरिक्स (कुमार और टोनी कक्कर) बकवास है। कृति महेश की कोरियोग्राफी औसत है। संचित बलहारा और अंकित बलहारा का बैकग्राउंड म्यूजिक बहुत है। इवान मुलिगन का कैमरावर्क ठीक है। राजेश पांडे का संपादन और कसा हुआ होना चाहिए था।