Ranveer Singh को ऐसे मिला था बैंड बाजा बारात के लिए ऑडिशन

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Ranveer Singh Actor
Ranveer Singh

मुंबई। बॉलीवुड के हाइएस्ट पेड अभिनेताओं में से एक रणवीर सिंह (Ranveer Singh) ने इंडस्ट्री में अब से 10 साल पहले यानि 10 दिसंबर 2010 को इंडस्ट्री में बतौर लीड एक्टर कदम रखा था। वह फिल्म थी बैंड बाजा बारात (Band Baaja Baarat)…जिसने बॉक्स ऑफिस पर न केवल कमर्शियल सक्सेस होने का खिताब हासिल किया, बल्कि रणवीर देल्ही के टिपिकल लड़के की भूमिका में ऐसे जंचे कि वे क्रिटिक्स को भी प्रभावित करने में सफल रहें। जबकि आमतौर पर किसी नवोदित अभिनेता के लिए क्रिटिक्स की राय पॉजिटिव बमुश्किल ही रहती है। खैर, कहते है कि किसी ख्वाब को हासिल करने के लिए अगर आप सच्चे मन से दुआ और मेहनत करें तो वह सब भले ही देर सबेर पर आपकी झोली में आता है। रणवीर (Ranveer Singh) के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ।

बात जनवरी 2010 की थी। सर्दियां अपने उरूज पर थी। कंपकंपाते मौसम में एक दिन रणवीर के फोन की घंटियां बज उठती है। दूसरे छोर पर कोई और नहीं शानू शर्मा थे। जो इंडस्ट्री के सबसे बड़े बैनर यशराज फिल्म्स में मौजूद कास्टिंग डिवीजन को लीड कर रहे थे। इस बातचीत में रणवीर को बिना की लागलपेट के बताया गया कि आपको ऑडिशन के लिए आना है। फिल्म का नाम है बैंड बाजा बारात। यही नहीं अगर आप चुने गए तो उसके लीड कैरेक्टर को प्ले कर सकते हैं। बातों का सिलसिला आगे बढ़ता गया और रणवीर तब तक जान गए थे उन्हें दिल्ली के एक ऐसे लड़के की भूमिका निभानी है जो अक्खखड़ हो और रोमांटिक भी। कहानी एक ऐसे वेडिंग प्लानर बिटटू शर्मा की थी जो फर्श से अर्श का सफर सिने स्क्रीन पर करता देखा जाएगा।

रणवीर की जिंदगी का यह पहला बड़ा मौका था। जिसे वे किसी हाल में जाने नहीं देना चाहते थे। इसलिए उन्होंने पूरी शिद्दत से ऑडिशन दिया। जिसका वीडियो जब कंपनी के vice प्रेसीडेंट आदित्य चोपड़ा के पास पहुंचा तो वे तत्काल उन्हें इस किरदार के लिए ओके कर चुके थे। लेकिन, बात अभी बाकी थी। लेखक-निर्देशक मनीष शर्मा को कुछ और समझने की जरूरत थी। सम्भतः वे अभी भी पूरी तरह श्योर नहीं थे कि मुंबई की आबोहवा में रचा-बसा यह लड़का (Ranveer Singh) दिल्ली के टिपिकल बॉय का किरदार कैसे निभा पाएगा? ऐसे में उन्होंने रणवीर को अगले दो हफ्तों तक कुछ और ऑडिशन के लिए बुलाया। आखिरकार मनीष शर्मा उनके कैलिबर के बारे में पूरयर पहला मौका था जिसमें वे जरा सी चूक नहीं चाहते थे। अतः वे अपने कैरेक्टर को समझने दिल्ली विश्वविद्यालय परिसर में छात्रों के साथ रहने पहुंच गए। यहाँ से मिले प्रैक्टिकल अनुभव ने उनकी अदाकारी में वो जान डाली की लोग आज भी ‛बिट्टू शर्मा’ को भूले नहीं।