Shankar डेथ एनिवर्सरी: ऐसे हुई थी जय किशन से खटपट, वादा टूटने से छूट गया साथ

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Shankar Singh Raghuvansi
Shankar Singh Raghuvansi

BolBolBollywwod, स्पेशल स्टोरी। संगीत की दुनिया के चमकते सितारों का जिक्र जब कभी होता है… तब शंकर-जय किशन का नाम बेहद अदब से लिया जाता है। इस जादूगर जोड़ी ने अपने संगीत के जादू से कई स्थापित परंपराओं को बदल कर रख दिया। उनकी एक से बढ़कर एक धुनों ने म्यूजिक को नई ऊंचाइयों से रूबरू कराया। दरअसल, आज इस जोड़ी का जिक्र इसलिए किया जा रहा हैं क्योंकि म्यूजिक के इन फनकारों में से एक शंकर सिंह रघुवंशी (Shankar Singh Raghuvanshi) की आज डेथ एनीवर्सरी है। शंकर जी का निधन 26 अप्रैल 1987 को हो गया था। ऐसे में उनके चाहने वाले उन्हें पूरी शिद्दत से श्रद्धा सुमन अर्पित कर रहे हैं।

प्रारंभिक दिनों में तबला बजाते थे
शंकर (Shankar Singh Raghuvanshi) ने अपने प्रारंभिक दिनों के दौरान तबला बजाया और कला को औपचारिक रूप से बाबा नासिर खान साहिब से सीखा। कई वर्षों तक शंकर ने प्रसिद्ध संगीतकार ख्वाजा खुर्शीद अनवर के शिष्य के रूप में तालीम हासिल और आर्केस्ट्रा में अभिनय भी किया था। शंकर सिंह रघुवंशी का जन्म 15 अक्टूबर 1922 को पंजाब में हुआ था। बचपन के दिनों से ही शंकर संगीतकार बनना चाहते थे।

बताया जाता है कि अपने म्यूजिक करियर के प्रारंभिक दिनों में शंकर (Shankar Singh Raghuvanshi) ने सत्यनारायण और हेमावती द्वारा चलाए जाने वाले थियेटर ग्रुप में काम किया था। यही नहीं वे पृथ्वी थियेटर के सदस्य भी थे। जहां पर उनसे तबला बजाने का काम लिया जाता था और जब कभी जरूरत पड़ती पृथ्वी थियेटर के प्ले में अदाकरी भी कर लिया करते थे।दूसरी ओर, यह वह वक़्त था जब जयकिशन (Jayakishan Musician) भी बतौर संगीतकार खुद को बॉलीवुड इंडस्ट्री में स्थापित करने जूझ रहे थे। इसके बाद शंकर की मुलाकात जयकिशन से हुई। बातों-मुलाकातों का सिलसिला दोस्ती में बदला और शंकर ने अपने इस दोस्त को पृथ्वी थियेटर में हारमोनियम बजाने के लिए नियुक्त करवा लिया। इस बीच ‛शंकर और जयकिशन’ ने संगीतकार हुस्नलाल-भगतराम की शार्गिदी में संगीत सीखना भी शुरू कर दिया था। जिसके बाद यह जोड़ी ऐसी मिसाल बनकर सामने आई कि बाद के सालों में दोनों ने वह संगीत रचा जो उनके बाद अब तक कोई नहीं रच पाया।

‛बरसात’ के संगीत ने कर दिया स्थापित
बात वर्ष 1948 की है। देश आजाद हुए एक साल बीत चुका था। माहौल में उमंग और चुनौतियां मौजूद थी। इस बीच दिग्गज अभिनेता राजकपूर अपनी फिल्म ‛बरसात’ (Barasaat) के लिए म्यूजिशियन की तलाश कर रहे थे। चूंकि वे चाहते थे कि उनकी फिल्म में ऐसा संगीतकार काम करें जो दर्शकों की उम्मीद पर खरा उतर सकें। इसके चलते उन्होंने शंकर-जयकिशन को मिलने का न्योता भेजा। बाद में शंकर-जयकिशन के म्यूजिक रचने के तौर तरीके से वे काफी प्रभावित हुए। फिल्म ‛बरसात’ मे इस जोड़ी ने ‛जिया बेकरार है’ और ‛बरसात में हमसे मिले तुम सजन’ जैसा सुपरहिट संगीत दिया। फिल्म ‘बरसात’ की कामयाबी के बाद शंकर-जयकिशन बतौर संगीतकार खुद को इंडस्ट्री में स्थापित करने में सफल हो गए।

ऐसे टूट गया याराना, फिर नहीं हो पाई ‛सुलह’
वैसे तो  इस जोड़ी ने 1949 से 1971 तक कई फिल्मों में एक से बढ़कर एक संगीत दिया। लेकिन, एक वक्त ऐसा भी आया जब इस जोड़ी में ‛दरार’ पड़ गई। रिश्ते की गहराई सतह पर आ गई। दरअसल, ईसके पीछे बात यह थी कि जब से इन्होंने एक दूसरे के साथ काम शुरू किया था तब ही उनके बीच एक शर्त रखी गई थी। जिसके मुताबिक शंकर और जयकिशन दोनों में कोई भी कभी किसी को नहीं बताएंगे कि धुन किसने बनाई है। लेकिन, एक बार ऐसा हुआ कि जयकिशन इस वादे को भूल गए और फिल्म ‛संगम’ के सुपरहिट गीत ‛ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर कि तुम नाराज न होना’ की धुन को लेकर खुलासा कर दिया कि यह उन्होंने बनाई थी। बस फिर क्या था, वादा टूटते ही शंकर (Shankar Singh Raghuvanshi) का दिल भी टूट गया…। आखिरकार नाराजगी के चलते वे अलग हो गए। आपको बता दें कि शंकर-जयकिशन  को सबसे ज्यादा 9 बार सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।