RIP Dilip Kumar : कारोबारी, कलाकार, निर्माता और ‛नेता’ भी… ऐसा था सफर

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Dilip Kumar Veteran actor
Dilip Kumar Veteran actor

BolBolBollywood.com स्पेशल, स्टोरी, मुंबई। मुंबई। बॉलीवुड के एक युग का अंत हो गया। बुधवार को 98वें साल की उम्र में ट्रेजडी किंग (Dilip Kumar) दुनिया भर में अपने करोड़ों चाहने वालों को अलविदा कह गए। 7 जुलाई को सुबह-सुबह उनके (Dilip Kumar Veteran actor) निधन की खबर किसी सदमे से कम नहीं थी। वे काफी समय से उम्र संबंधी समस्या से जूझ रहे थे। हाल ही में उन्हें हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था। जहां करोड़ों चाहने वालों की दुआएं काम आई और वे स्वस्थ हो गए थे। लेकिन, कुछ ही दिनों बाद फिर दिक्कतें शुरू हो गई। जिसके बाद उन्हें हॉस्पिटलाइज्ड कराना पड़ा। जहां डॉक्टरों की टीम पूरी मुस्तैदी से आईसीयू में उनका उपचार कर रही थी। लेकिन, किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था। और वे (Dilip Kumar Veteran actor) आज सुबह सभी को अलविदा कहते हुए उस अनदेखी और अजीम दुनिया के लिए कूच कर गए।

यह एक बड़ा परिवार था, जिसमें 13 सदस्य हुआ करते थे
पाकिस्तान के पेशावर में 11  दिसंबर 1922 की सर्द सुबह बॉलीवुड के ट्रेजडी किंग दिलीप कुमार का जन्म हुआ था। उनका जन्म आयशा बेगम और लाला गुलाम सरवार खान के यहां हुआ था। यह एक बड़ा परिवार था। जिसमें 13 सदस्य हुआ करते थे। वे नूर मोहम्मद और अय्युब के बाद तीसरे बेटे थे। जिनका नाम मोहम्मद युसूफ खान रखा गया। उनके पिता सरवार खान का फ्रूड्स का बिजनेस हुआ करता था जिसकी वजह से वे बॉम्बे से कलकत्ता आया जाया करते थे। ऐसे में उनके परिवार का पड़ोसी लाल बासेरनाथ (पृथ्वीराज कपूर) के साथ मधूर संबंध थे। दरअसल, दिलीप कुमार के बड़े भाई अय्युब की चोट की वजह से उनका पूरा परिवार इलाज के लिए मुंबई शिफ्ट हो गया था। जहां वे किराये के मकान में नागदेवी गली में रहने लगे। लेकिन जल्द ही वे देओदली में शिफ्ट हो गए। दिलीप कुमार के स्कूल के दिनों में उनकी दोस्ती मुकरी से हो गई। जिन्होंने बाद में फिल्म इंडस्ट्री को भी ज्वाइन किया था।

बचपन से खेल गतिविधियों में खास रूचि रखने वाले यूसुफ खान (Dilip Kumar Veteran actor) का क्रिकेट और फुटबॉल के प्रति जुनून देखने लायक था। वे अपने मोहल्ले से लेकर कॉलेज के दिनों तक फेमस फुटबॉल खिलाड़ी माने जाते थे। इस दौरान उन्हें खालसा कॉलेज की टीम से खेलने का ऑफर भी मिला। उस वक्त खालसा कॉलेज की टीम फुटबॉल के लिए सबसे मजबूत मानी जाती थी। लेकिन, उनके बड़े भाई नासिर चाहते थे कि वे अपने पिता के व्यवसाय में मदद करें और पैसे कमाए। इस वजह से दिलीप कुमार अपने अंडर ग्रेजुएशन के दौरान पिता के कारोबार में मदद भी करने लगे।  इस सिलसिले में एक बार उन्हें नैनीताल जाना पड़ा जहां उनकी मुलाकात मशहूर अदाकारा देविका रानी से हुई। जिन्होंने उन्हें मुंबई लौटने पर मुलाकात के लिए कहा था।

ऐसे मोहम्मद यूसुफ से बन गए दिलीप कुमार
कैंटीन के बिजनेस में हाथ आजमाने के बाद उन्होंने महसूस किया कि अच्छा चलने वाला बिजनेस उनके बस की बात नहीं। और वे अपने दूसरे प्रयास के लिए बॉम्बे टॉकीज पहुंच गए। जहां उनकी मुलाकात देविका रानी से हुई। जहां उन्हें 500 रुपए महीने में काम मिल गया। जहाँ उन्हें 3 नाम सुझाए गए। इनमें से एक नाम दिलीप कुमार (Dilip Kumar Veteran actor) जो हिंदी सिनेमा से जुड़ा हुआ था उसे स्वीकार्य कर लिया गया। लेकिन एक रूढ़िवादी परिवार से होने की वजह से उनके लिए नया नाम लेकर इंडस्ट्री में शुरुआत करना मुमकिन नहीं था। क्योंकि उनके पिता शायद ही इसकी इजाजत देते।

1944 में आई पहली फिल्म ज्वार भाटा
1944 में आई पहली फिल्म ज्वार भाटा से दिलीप कुमार (Dilip Kumar Veteran actor) ने एक नई अदाकारा मृदुला के साथ इंडस्ट्री में पदार्पण किया। लेकिन उन्होंने अपनी नई आय के स्त्रोत के बारे में परिवार को नहीं बताया था। वे झूठ बोल गए थे। लेकिन यह ज्यादा दिन नहीं चल सका। वे तब पकड़े गए जब उनके पड़ोसी और रिश्तेदार अखबार में छपी उनकी फोटो लेकर उनके पिता के पास पहुंच गए। उनकी दूसरी फिल्म प्रतिमा भी इसी साल रिलीज की गई थी लेकिन बॉक्स ऑफिस यह कुछ खास नहीं कर सकी। इसके बाद 1947 में उन्होंने अपनी पहली फिल्म जुगुनू दी। इसके बाद उनकी नरगिस के साथ 1948 में फिल्म मेला आई। जिसने दर्शकों पर एक अलग छाप छोड़ी। 1949 में महबूब खान की मेगा हिट्स फिल्म अंदाज जो उन्होंने राजकपूर और नरगिस के साथ बनाई थी इसमें पहली बार दिलीप कुमार ने नरगिस के ठुकराए हुए कैरेक्टर का रोल निभाया था। यह पहली बार था जब ट्रैजिक किरदार निभाया था। इसके बाद आई कुछ फिल्में जिनमें बाबुल 1950, जोगन 1950, दीदार 1951, संग दिल 1952, देवदास 1955, मधुमती 1958 के अलावा 1959 में आई शबनम ने उन्हें इंडस्ट्री में ट्रेजडी किंग की छवि में ढालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस फिल्म में उनकी जोड़ी कामिनी कौशल के साथ हिट रही। इस वक़्त तक उन्होंने कई बॉक्स ऑफिस हिट जिनमें हलचल 1951, दाग 1952, शिकस्त 1953, अमर 1954, उड़न खटोला 1955 और इंसानियत 1955 शामिल हैं।

ट्रैजिक छवि तोड़ने की कोशिश भी की
एक जैसी भूमिकाओं से ऊबकर उन्होंने महबूब खान के साथ 1953 में आन बनाई। जिसमें उन्होंने खुशमिज़ाज जय का किरदार निभाया। जो राजकुमारी राजेश्वरी को रिझाने की कोशिश में लगा रहता है। यह उनकी पहली कलरफुल फिल्म थी जिसका लंदन के साथ यूरोप में प्रीमियर किया गया था। इसके अलावा उन्होंने आज़ाद, इंसानियत और 1960 में आई कोहिनूर में अपनी छवि तोड़ने की कोशिश की थी। दरअसल, अपने रोल में विविधता लाने की मूल वजह उनके डॉक्टर थे जिन्होंने ऐसे रोल को उनकी मानसिक स्थिति के लिए ठीक नहीं बताया था। इसके बाद 1957 में आई बी आर चोपड़ा की फिल्म नया दौर से वे अपने आप को इंडस्ट्री में तब के सुपरस्टार राज कपूर और देव आनंद के साथ स्थापित कर चुके थे।

…और आखिर, हिंदी सिनेमा का वह नींव का पत्थर
1960 में आई के आसिफ की फिल्म मुगल-ए-आजम हिंदी सिनेमा का मील का पत्थर साबित हुई। इंडस्ट्री में 11 साल बिताने के बाद स्क्रीन की सुपर रोमांटिक जोड़ी मधुबाला और दिलीप कुमार (Dilip Kumar Veteran actor) सामने आई। इसके बाद तो उनकी जोड़ी इतनी पसंद की गई कि उनके फैंस फिल्मों के इतर भी उनके निजी राज जानने के लिए उत्सुक रहते थे। यह फ़िल्म हिंदी सिनेमा की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म थी। 1961 में दिलीप कुमार प्रोड्यूसर की भूमिका में आ गए और उन्होंने डायरेक्टर नितिन बोस के निर्देशन में गंगा जमुना का निर्देशन किया। वे इस फिल्म के हर पहलू से सीधे तौर पर जुड़े रहे। उन्होंने भोजपुरी लहजे में वैजंतीमाला को असिस्ट किया। यह दूसरी फिल्म थी जिसने 1964 में राष्ट्रीय अवॉर्ड हासिल किया था। उन्होंने राम और श्याम में डबल रोल निभाया था जो उनकी आखिरी बड़ी हिट फिल्म थी जिसमें उन्होंने मुख्य भूमिका निभाई थी। एक इंटरव्यू के मुताबिक दिलीप कुमार राम और श्याम, दिल दिया दर्द लिया 1968 और आदमी 1968 की सफलता के बाद भी महसूस करने लगे थे कि वे एक्टिंग की तरफ कम झुकाव महसूस कर रहे हैं।

सायरा बानो के साथ पहली फिल्म बंगाली थी
1970 में तपन सिन्हा के निर्देशन में बनी फिल्म बंगाली सगीना महतो फिल्म जिसमें उनके अपोजिट सायरा बानू थी बनाई गई। यह उनकी पहली बंगाली फ़िल्म थी जिसे 1974 में सगीना नाम से उसी स्टार कास्ट के साथ फिर से बनाया गया था। 1972 में आई बीआर चोपड़ा की दास्तान बॉक्स ऑफिस पर कुछ खास नहीं कर पाई और नए कलाकार राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन और शत्रुघ्न सिन्हा इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने के लिए चुनौती पेश कर रहे थे। हालांकि 1976 में आई बैरंग को क्रिटिकली सराहा गया।

1981 में किया कमबैक, शक्ति का यादगार क्लाइमैक्स..!
1981 में दिलीप कुमार (Dilip Kumar Veteran actor) ने कमबैक किया और वे मनोज कुमार की फिल्म क्रांति में नजर आए। जिसमें शशि कपूर, मनोज कुमार, हेमा मालिनी और शत्रुघ्न सिन्हा मुख्य भूमिकाओं में थे। फिर 1982 में  आई विधाता में वे सुभाष घई के साथ फिल्म निर्माता की भूमिका में थे। इसी साल उन्होंने रमेश सिप्पी की अभिताभ बच्चन स्टारर शक्ति में भी काम किया। इस फिल्म में उनके अभिनय को दर्शकों और समीक्षकों का खूब प्यार मिला। इस फिल्म का क्लाइमेक्स जब अमिताभ बच्चन का कैरेक्टर दिलीप कुमार की बाहों में दम तोड़ देता हैं.. आज भी हिंदी सिनेमा का सबसे यादगार दृश्य हैं।

नवोदित कलाकार अनिल कपूर के साथ मशाल और फिर कर्मा
इसके बाद 1984 में उन्होंने ने नवोदित अभिनेता अनिल कपूर के साथ मशाल में स्क्रीन शेयर की थी। यह फिल्म यश चोपड़ा के निर्देश में बनी थी। इसके बाद 1986 में सुभाष घई ने शोले की कहानी में कुछ बदलाव कर कर्मा बनाई।1959 में आई पैगाम के तीन दशक बाद राजकुमार और दिलीप कुमार ने 1991 में सौदागर में स्क्रीन शेयर की थी। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट रही। इसके बाद वे 1998 में आई किला में छोटी भूमिका में दिखाई दिए थे।

बॉलीवुड इंडस्ट्री के पहले खान
दिलीप कुमार (Dilip Kumar Veteran actor) इंडस्ट्री के पहले खान थे। वे हमेशा उन सभी प्रोजेक्ट के लिए सतर्क थे जो उनसे जुड़े थे। दिलीप कुमार ने अपनी सह कलाकार सायरा बानो के साथ 1966 में निकाह किया था। उस वक़्त सायरा बानो उनसे बहुत छोटी थी। उन्होंने आशमा रहमान से भी शादी की थी लेकिन 1983 में उनका तलाक़ हो गया। वे महाराष्ट्र से 2002 से 2006 के बीच कांग्रेस पार्टी की तरफ से राज्यसभा सदस्य भी रह चुके हैं।

9 बार फिल्म फेयर और फिर life time achievement
दिलीप कुमार 9 बार फिल्म फेयर अवार्ड से सम्मानित हो  चुके हैं। इनमें से 8 सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार और एक विशेष अवॉर्ड शामिल हैं। उनको पहला फिल्म फेयर दाग के लिए दिया गया था, फिर आज़ाद, देवदास, नया दौर, कोहिनूर, लीडर, राम और श्याम, शक्ति के लिए फिल्म फेयर से सम्मानित किया गया। वे 1993 में लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किए गए। 2005 में हिंदी सिनेमा में विशेष योगदान के विशेष फिल्म फेयर से नवाजे गए। इसके साथ ही उन्हें 1994 में दादा साहेब फालके पुरस्कार, 1998 में पाकिस्तान का सम्मान निशान ए इम्तिहाज प्रदान किया गया। इसके अलावा वे 1991 में पद्म भूषण और 2015 में पद्म विभूषण अवॉर्ड हासिल कर चुके हैं। 2014 में उनकी आत्म कथा दिलीप कुमार नाम से ही आ चुकी हैं।