बच्चों की पिक्चर को मिला यू/ए सर्टिफिकेट, कोर्ट ने लगाई सेंसर बोर्ड को लताड़

chidiyakhana

मुंबई।  बॉम्बे हाईकोर्ट ने बच्चों के लिए बनाई गई फिल्म चिडियाखाना को आपत्तिजनक सीन और शब्द हटाए जाने के बाद भी यू सर्टिफिकेट न दिए जाने पर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सेंसर बोर्ड) को जमकर लताड़ा है।  कोर्ट ने कहा है बोर्ड सिर्फ प्रमाणपत्र देने का अधिकार रखता है, सेंसरशिप लगाने का नहीं।  वो ये नहीं तय कर सकता कि कौन क्या देखना चाहता है।   

फिल्म “चिड़ियाखाना” बिहार के एक लड़के की कहानी है, जो फुटबॉल खेलने के अपने सपने को पूरा करने के लिए मुंबई आता है। चिल्ड्रन फिल्म सोसाइटी (सीएफएस) की एक याचिका पर सुनवाई के दौरान बॉम्बे हाइकोर्ट की बेंच जस्टिस एससी धर्माधिकारी और गौतम पटेल ने कहा कि सेंसर बोर्ड सिर्फ ये समझ कर बैठा कि उसी के पास निर्णय करने का अधिकार है।  ऐसे में बोर्ड की भूमिका को फिर से परिभाषित करना होगा। 

बाल फिल्म सोसाइटी ने चिड़ियाखाना नाम की फिल्म को इस साल जनवरी में सेंसर में भेजा था।  सेंसर ने फिल्म में कुछ आपत्तिजनक सीन और एक शब्द को लेकर फिल्म को यू/ए सर्टिफिकेट दे दिया यानि बच्चे इसे अकेले नहीं देख सकते। जबकि इस फिल्म को हर आयु वर्ग के बच्चों के लिए बनाया गया है और उसे स्कूलों में दिखाया जाना है। 

कोर्ट ने कहा कि सेंसर बोर्ड ये समझता है कि कोई आपत्तिजनक शब्द फिल्म से हटा लेने से वो बात समाज से पूरी तरह से खत्म हो जायेगी।  ये एक शुतुरमुर्ग की सोच है जो जमीन में अपना सिर गाड कर ये समझता है कि आसपास कोई ख़तरा नहीं है।  क्या सीबीएफसी के लोगों के खुद के बच्चे नहीं हैं।  ये आप तय नहीं करेंगे कि कौन क्या देखना चाहता है। दुनिया बदल रही है।

कोर्ट  बच्चों की फिल्मों को सर्टिफिकेट देते समय बोर्ड की नीति और रेखांकित करने के लिए एफिटडेविट दायर करने का निर्देश दिया है। इस मामले की सुनवाई 5 अगस्त को होगी।